Friday, October 21, 2016

सामाजिक मीडिया और हिन्दी




सामाजिक मीडिया और हिन्दी

आजकल जब लगभग हर चीज को सामाजिक मीडिया में उसकी उपस्थिति से नापा जा रहा है, हर संस्था, व्यक्ति, सरकार, कंपनी, साहित्यकर्मी से समाजकर्मी  तक और नेता से अभिनेता तक को सामाजिक मीडिया में उसके वज़न, प्रभाव और लोकप्रियता की कसौटी पर तौला जा रहा है यह स्वाभाविक है कि इस नई तकनीकी-सामाजिक शक्ति और भाषा के संबंध को भी हम समझने की कोशिश करें।

कुछ बुनियादी बातें शुरु में। यह सामाजिक मीडिया भी अंततः और प्रमुखतः एक तकनीकी चीज है और हर तकनीकी आविष्कार की तरह तत्वतः मूल्य-निरपेक्ष है। यानी हर तरह के काम के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है चाहे वह अच्छा हो या बुरा। इसलिए हर तकनीकी आविष्कार की तरह इसके दुरुपयोग पर हमें ज्यादा आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हर वैज्ञानिक या तकनीकी आविष्कार, यदि वह एक व्यापक समाज के लिए रोचक या उपयोगी है, अपनी एक नई जगह बना लेता है। यह जगह पूरी तरह नई भी हो सकती है या पुरानी कुछ चीजों को हटा कर, घटा कर बनाई गई जगह भी। और जब यह नई तकनीक संवाद और संप्रेषण से जुड़ी हो तो स्वाभाविक है कि वह अपनी विशिष्टताओं के साथ  संवाद और संप्रेषण के पुराने, मौजूदा तरीकों, उपकरणों और तकनीकों को कुछ विस्थापित करके ही अपनी जगह बनाती है।

 जब प्रिंट आया तो वाचिक संवाद की सर्वव्याप्तता घटी। जब रेडियो आया तो उसने लिखित और मुद्रित माध्यम को थोड़ा खिसका कर अपनी जगह बनाई। जब टेलीविजन आया तो बहुत से लोगों ने मुद्रित माध्यम के अवसान की घोषणा कर दी। उसका अवसान तो नहीं हुआ लेकिन उसके विकास, प्रभाव, व्याप्तता और राजस्व पर सीधा प्रभाव पड़ा और आज भी पड़ता ही जा रहा है। इतना कि आज टीवी प्रिंट माध्यम से प्रसार और राजस्व दोनों में लगभग आगे निकल रहा है। अब सोशल मीडिया नाम के इस नए प्राणी ने संचार माध्यमों की दुनिया को फिर बड़े बुनियादी ढंग से बदल दिया है। यह प्रक्रिया जारी है और कहां जाकर स्थिर होगी, क्या समीकरण और अनुपात होंगे इन नए माध्यमों के बीच, और कौन से नए, अभी अदृश्य माध्यम क्षितिज पर उभर कर इन समीकरणो को भी उलट पुलट कर देंगे यह कोई नहीं जानता।

लेकिन इन नए संप्रेषण मंचों और पुरानों में एक बुनियादी अंतर है- अखबार, पुस्तकों, पत्रिकाओं, रेडियो और टीवी से अलग इस माध्यम की संवाद क्षमता इसे शायद इन सबसे ज्यादा निजी, आकर्षक, अंतरंग और इसलिए शक्तिशाली बनाती है। दूसरे माध्यम एकदिशात्मक थे। यह नया माध्यम अंतःक्रियात्मक है, आपसी संवाद संभव बनाता है, अपने उपभोक्ता को केवल संप्रेषण का प्राप्तकर्ता नहीं, संवादी और संप्रेषक भी बनाता है। और अब जब यह डेस्कटॉप कम्प्यूटरों, लैपटॉपों से निकल कर मोबाइल फोन पर आ गया है तो सर्वव्यापी, सर्वसमय, सर्वत्र और सर्वसुलभ हो गया है।  इसीलिए यह इतना सम्मोहक, इतना सोख लेने वाला बनता जा रहा है।
  
और हर नए, अपने समय के लिए आधुनिक और सशक्त संचार-संवाद माध्यम की तरह इस सामाजिक मीडिया ने भी मानवीय संबंधों, परिवारों और रिश्तों के आंतरिक समीकरणों, तौर तरीकों, संवाद शैलियों को प्रभावित किया है। इसने राजनीतिक रणनीतियों, विमर्श और चुनावी नतीजों में अपनी जगह बनाई है। कंपनियों और उनके उत्पादों- सेवाओं के प्रचार- प्रसार, उपभोग, मार्केटिंग और ग्राहकों तक पहुंचने, उन्हें छूने के तौर तरीकों को बदला है। व्हाट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन आदि ने एक ऐसी आभासी दुनिया बना दी है जिसमें 8-10 साल के बच्चों से लेकर 50-60 की गृहणियों को भी अपने चंगुल में ऐसा फाँस लिया है कि उनका अधिकांश मुक्त समय इसमें ही खपने लगा है। व्यापार, उद्योग, अभिशासन, मनोरंजन, राजनीति और मीडिया जगत के लोगों के लिए तो ये मंच महत्वपूर्ण हैं ही।

इसलिए अब हमारी- आपकी बोलने और लिखने की भाषा पर भी उसका असर दिखने और कई बार सिर चढ़ कर बोलने लगे तो क्या आश्चर्य? सारी भाषाओं में यह असर है पर हमारी हिन्दी पर कुछ ज्यादा ही।
भाषा के दो प्रमुख आयाम हैं। एक, उसका शुद्ध भाषिक आयाम जिसमे उसके शब्दों, वाक्य रचना, व्याकरण, शब्दकोश आदि पर ध्यान रहता है। दूसरा, भाषा का सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक संदर्भ जिसमें उसके इन संदर्भो में प्रयोग, परिवर्तनो, अर्थों, प्रभावों आदि पर ध्यान होता है।

लेकिन केवल भाषा पर सामाजिक मीडिया के प्रभाव और उनके अन्तर्सम्बन्ध पर बात करने से बेहतर होगा हम आज के समय में संवाद और संप्रेषण तथा भाषा के सम्बन्ध पर उसकी संपूर्णता में बात करें। वह इसलिए कि हम जानते हैं कि भाषा यानी शब्द किसी शून्य में नहीं वृहत्तर समाज की तमाम प्रवृत्तियों, रुझानों, सक्रियताओं, प्रक्रियाओं और चलन के बीचों बीच स्थित, सक्रिय और गतिमान रहते हैं।
आज संसार की लगभग हर भाषा पर सामाजिक मीडिया के प्रभाव को महसूस किया जा रहा है, उसे समझने की कोशिश हो रही है और विमर्श हो रहा है। इस नए माध्यम ने हर नए माध्यम की तरह हर भाषा के प्रयोग के तौर तरीकों, शब्दकोश, शैली, शुद्धता, व्याकरण और वाक्य रचना को प्रभावित किया है। यह असर लिखित ही नहीं बोलने वाली भाषा पर भी दिख रहा है। जब ईमेल आई तो कहा गया कि पत्र लिखना ही समाप्त हो जाएगा। वह तो नहीं हुआ लेकिन हाथ या टाइपराइटर से पत्र लिखना ज़रूर लगभग खत्म हो गई है। कम से कम उनमें जो कम्प्यूटर तक पहुंच गए हैं। पर बात यहीं तक नहीं है। अब एसएमएस, ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सऐप ने बहुत से लोगों के लिए ईमेल को भी अनावश्यक और अप्रासंगिक बना दिया है।

एसएमएस ने तो अंग्रेजी से शुरु करके हर भाषा में शब्दों के रूप रंग और वर्तनी को सिर के बल खड़ा कर दिया है। छोटे से फोन की स्क्रीन पर समय और श्रम बचाने के लिए शब्दों के संक्षिप्ततम रूपों के आविष्कार से लेकर एकदम नए शब्दों (उन्हें शब्दिकाएं कहें तो क्या ज्यादा सटीक न होगा...?) को गढ़ लिया गया है। आज जिस एलओएल (lol) का इस्तेमाल हिन्दी वाले भी धड़ल्ले से कर रहे हैं हिन्ग्लिश या रोमन हिन्दी में उसके आविष्कार को 25 साल हो चुके हैं। और बिना उसका असली रूप और अर्थ समझे उसका इस्तेमाल करने वाले बहुत से युवा ज्ञानी हिन्दी में उसे लोल्ज़ लिखने-बोलने लगे हैं।

भाषा और शब्दों के सौन्दर्य, मर्यादा, गरिमा और स्वरूप की चिन्ता करने वाले सभी इस नई भाषा के प्रभाव और भविष्य पर तो चिन्तित हैं ही इस पर भी हैं कि इस खिचड़ी, विकृत, कई बार लंगड़ी भाषा की खुराक पर पल-बढ़ रही किशोर और युवा पीढ़ी वयस्क होने पर किसी भी एक भाषा में सशक्त और प्रभावी संप्रेषण के योग्य बचेगी या नहीं। यह खतरा इसलिए भी गंभीर होता जा रहा है कि ये नई पीढ़ियां पाठ्यपुस्तकों के अलावा कुछ भी गंभीर, स्वस्थ, विचारपूर्ण लेखन, साहित्य, वैचारिक पठन से लगातार दूर जा रही हैं। अच्छी, असरदार भाषा अच्छा पढ़ने से ही आती है। अच्छी भाषा के बिना गहरा, गंभीर विचार, विमर्श, चिंतन और ज्ञान-निर्माण संभव नहीं।

वे पीढियां जो विद्यालयों की मजबूरन पढ़ाई के बाहर केवल या अधिकांशतः यह खिचड़ी, लंगड़ी-लूली, भ्रष्ट भाषा ही पढ़ लिख रही हैं उसकी बौद्धिक क्षमताएं ठीक से विकसित होंगी कि नहीं? अगर गंभीर चिंतन और विमर्श में सक्षम ही नहीं होंगे हमारे भावी नागरिक तो उसका उनके विकास के अवसरों और व्यापक सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, बौद्धिक, राजनीतिक विकास पर कैसा असर पड़ेगा इस पर अभी हमारे बौद्धिक समाज, सरकार और नीतिनिर्माताओं का ध्यान बहुत कम गया है।

हिन्दी पर यह मार दोहरी है। स्वाभिमानी समाजों के विपरीत व्यापक हिन्दी समाज एक आत्मलज्जित समाज है। अंग्रेजी की शक्ति और प्रतिष्ठा से आक्रांत, स्वभाषा-गौरव से हीन, अंग्रेजी और अंग्रेजी वालों के सामने भीतर से दीन हो जाने वाला यह समाज अपनी सहज, सुपरिचित, सशक्त हिन्दी में अंग्रेजी के शब्द ठूंस कर अपना दैन्य ढंकने की कोशिश में इतना व्यस्त है कि उसे पता ही नहीं चल रहा कि वह किसी भी भाषा के घर और घाट से वंचित भाषिक अपाहिज बनता जा रहा है।

लेकिन सामाजिक मीडिया का असर सारा नकारात्मक ही नहीं है। ट्विटर और एसएमएस की शब्द सीमा ने, खास तौर पर ट्विटर की, अपनी बात को चुस्त, कम से कम शब्दों में, 140 मात्राओं के भीतर कहने के अभ्यास को संभव बनाया है। संक्षिप्त, चुस्त, चुटीले किन्तु प्रभावी संप्रेषण का यह अभ्यास हमारी लंबी चौड़ी, अनावश्यक लफ्फाजी की हमारी पुरानी आदतों के लिए अच्छी खुराक है।

सामाजिक मीडिया ने सार्वजनिक अभिव्यक्ति और एक बड़े समुदाय तक निडर और बिना रोक- टोक और नियन्त्रण के अपनी बात, अपनी सोच और अनुभव पहुंचाना संभव बना कर अरबों लोगो को एक नई ताकत, समाज और अभिशासन में, छोटी बड़ी बहसों मे भागीदारी का नया स्वाद और हिम्मत दी है। सामाजिक विमर्श की यह मुक्त लोकतांत्रिकता शुभ है। लोकतांत्रिक भावना और व्यवहार को व्यापक और गहरा और समावेशी बनाने वाली है। इस नई ताकत ने सरकारों, शासनों, शासकों को ज्यादा पारदर्शी, संवादमुखी और जवाबदेह बनाया है, जनता के मन और नब्ज़ को जानने का नया माध्यम दिया है।

सामाजिक मीडिया की ताकत ने शासनों को, पार्टियों को, नेताओं उनके फैसलों, नीतियों और व्यवहारों को बदलने पर भी मजबूर किया है। यह सब स्वागतयोग्य है।

पर क्या इस मीडिया ने लोक- विमर्श को ज्यादा गंभीर, गहरा, व्यापक, उदार बनाया है? क्या जब करोड़ों लोग एक साथ इतना लिख- बोल रहे हैं इन मंचों पर उससे सार्वजनिक विमर्श की गुणवत्ता बढ़ी है, स्तर बेहतर हुआ है?

इस पर दो टूक राय देना संभव नहीं क्योंकि संसार में कुछ भी एकांगी, एकदिशात्मक नहीं होता, जैसा हम शुरु में ही कह चुके हैं। विमर्श की व्यापकता, भागीदारी, समावेशी चरित्र और विशालता बढ़ी है। ऐसे अनन्त लेखक, विचारक, प्रबुद्ध, चिंतनशील नागरिक सामने आए हैं जो अब तक अखबारों, पत्रिकाओं, चैनलों से बाहर थे। उन्हें भी तमाम नामी, स्थापित लोगों के साथ सीधे संवाद करने और उसे समृद्ध बनाने का अवसर मिला है। लेकिन हर तस्वीर की तरह इसका दूसरा पहलू भी है।


भाषा की आंतरिक संरचना और बाह्य प्रयोग को प्रभावित, और कई बार विकृत भी, करने के साथ साथ इस मीडिया द्वारा प्रयोगकर्ताओं को दी गई अज्ञातता ने एक नए तरीके की प्रवृत्ति को जन्म दिया है। इस अज्ञातता का लाभ उठा कर बहुत से लोगों ने गाली गलौज, अश्लीलता, वाचिक हिंसा और बेहद आपत्तिजनक, हिंसक और अपमानजनक बातों की अभिव्यक्ति से पूरे विमर्श को दूषित किया है। यह इतना बढ गया है कि किसी भी मुद्दे पर फेसबुक या ट्विटर पर एक शालीन बहस या संवाद करना ही लगभग असंभव हो गया है।

इस सामाजिक मीडिया का असामाजिक, सभ्यता-विरोधी चेहरा भी सामने आया है। विचारहीन, कुत्सा, अज्ञान, क्रूरता, प्रतिहिंसा, घृणा से भरे, सच्चे- झूठे आक्रोशों, कुंठाओं, दुराग्रहों से तिलमिलाते, कुढ़ते दिमागों को अपनी गंदगी इन माध्यमों पर निकालने का भी मौका और मंच मिल गया है और वे पूरे जोश से इसका फायदा उठा रहे हैं। इस परिघटना को समानांतर रूप से समाज और राजनीति में बढ़ती खाइयों, दूरियों, दुराग्रहों और दुरभिसंधियों ने बढ़ाया और तीखा किया है। अंग्रेजी में ट्रौलिंग कहलाने वाली इस प्रवृत्ति ने गालियों, धमकियों, चरित्र हत्या का सहारा लेकर बहुत से क्षेत्रों के प्रमुख व्यक्तियों, नेताओं, पत्रकारों, चिंतकों, अभिनेताओं के निजी जीवन को प्रभावित किया है।

संवाद, संप्रेषण और उनकी भाषा की सारी मर्यादाओं और शालीनता का यह बढ़ता अतिक्रमण और प्रदूषण अंततः अगली पीढ़ियों की सहज संवाद शैली का स्थाई अंग और तरीका न बन जाए इसकी चिन्ता करना समाज के सभी प्रबुद्ध वर्गों के साथ साथ राज्य की संस्थाओं और उनके नियामकों की साझा जिम्मेदारी है।

राहुल देव
13.9.2016


जागरण के लिए लिखा गया।

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