मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

राजभाषा विभाग का परिपत्र और हिन्दी का भविष्य

अमेरिका से भाषावैज्ञानिक डा. सुरेन्द्र गंभीर की टिप्पणी ------


मान्यवर प्रभु जोशी जी और राहुलदेव जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर हमारा ध्यान खींचा है।  

भारत में हिन्दी की और न्यूनाधिक दूसरी भारतीय भाषाओं की स्थिति गिरावट के रास्ते पर है। ऐसी आशा थी कि समाज के नायक भारतीय भाषाओं को विकसित करने के लिए स्वतंत्र भारत में  क्रान्तिकारी कदम उठाएंगे परंतु जो देखने में आ रहा है वह ठीक इसके विपरीत है। यह षढ़यंत्र है या अनभिज्ञता इसका फ़ैसला समय ही करेगा।

भाषा के सरलीकरण की प्रक्रिया स्वाभाविक है परंतु वह अपनी ही भाषा की सीमा में होनी चाहिए। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज अंग्रेज़ी और उर्दू के बहुत से शब्द ऐसे हैं जिसके बिना हिन्दी में हमारा काम सहज रूप से नहीं चल सकता। ऐसे शब्दों का हिन्दी में प्रयोग सहज और स्वाभाविक होने की सीमा तक पहच चुका है और ऐसे शब्दों के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए किसी को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यह भी ठीक है कि हिन्दी में भी कई बातों को अपेक्षाकृत सरल तरीके से कहा जा सकता है। परंतु यह सब व्यक्तिगत या प्रयोग-शैली का हिस्सा है। विभिन्न शैलियों का समावेश ही भाषा के कलेवर को बढ़ाता है और उसमें सर्जनात्मकता को प्रोत्साहित करता है।

भाषाओं का क्रमशः विकास कैसे होता है और इसके विपरीत भाषाओं का ह्रास कैसे होता है यह अनेकानेक भाषाओं के अध्ययन से हमारे सामने स्पष्ट होकर आया है। भारत में हिन्दी और शायद अन्य भारतीय भाषाओं के साथ जिस प्रकार का व्यवहार होता आ रहा है वह हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की ह्रास-प्रक्रिया को ही सशक्त करके बड़ी स्पष्टता से हमारे सामने ला रहा है। इस ह्रास-प्रक्रिया के बारे में विस्तार से लिखे जाने की आवश्यकता है। 

हम सबको मालूम है कि अंग्रेज़ी का प्रयोग भारत में केवल भाषागत आवश्यकता के लिए ही नहीं होता अपितु समाज में अपने आपको समाज में अपना ऊंचा स्थान स्थापित करने के लिए भी होता है। इसलिेए प्रयोग की खुली छुट्टी  मिलने पर अंग्रेज़ी शब्दों का आवश्यकता से अधिक मात्रा में प्रयोग होगा। दुनिया में बहुत सी भाषाएं लुप्त हुई हैं और अब भी हो रही हैं। उनके विश्लेषण से पता लगता है कि उनके कुछ भाषा-प्रयोग-क्षेत्रों (domians) पर कोई दूसरी भाषा आ के स्थानापन्न हो जाती है और फिर अपने शब्दों के स्थान पर दूसरी भाषा के शब्दों का प्रयोग उस भाषा के कलेवर को क्षीण बनाने लगता है। इस प्रकार विभिन्न विषयों में विचारों की अभिव्यक्ति के लिए वह भाषा धीर धीर इतनी कमज़ोर हो जाती है कि वह प्रयोग के लायक नहीं रह जाती या नहीं समझी जाती । क्षीणता के कारण उसके अध्ययन के प्रति उसके अपने ही लोग उसको अनपढ़ों की भाषा के रूप में देखने लगते हैं और उसकी उपेक्ष करने लगते हैं। यह स्थिति न्यूनाधिक मात्रा में भारत में आ चुकी है।

फिर कठिन क्या और सरल क्या इसका फ़ैसला कौन करेगा। हिन्दी के स्थान पर जिन अंग्रेज़ी शब्दों को प्रयोग  होगा उसको लिखने वाला शायद समझता होगा परंतु इसकी  क्या गारंटी है कि भारत के अधिकांश लोग उस  अंग्रेज़ी प्रयोग को समझेंगे। भाषा-विकास की दृष्टि से यह सुझाव बुरा नहीं है कि हिन्दी शब्दों का प्रयोग अधिकाधिक हो और जहां हिन्दी के कम प्रचलित शब्द लाएं वहां ब्रैकट में उसका प्रचलित अंग्रेज़ी पर्याय दे दें। जब हिन्दी का प्रयोग चल पड़े तो धीरे धीर अंग्रेज़ी के पर्याय को बाहर खींच लें। 

भाषा के समाज में विकसित करने के लिए भाषा में औपचारिक प्रशिक्षण अनिवार्य है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो बात हम अपनी भाषा में अलग अलग ढंग से और जिस बारीकी से कह सकते हैं वह अंग्रेज़ी में अधिकांश लोग नहीं कह सकते। इसलिए शिक्षा के माध्यम से अपनी भाषा को विकसित करना समाज में लोगों के व्यक्तित्व को सशक्त करने वाला एक शक्तिशाली  कदम है।

भाषा के प्रयोग और विकास के लिए एक  कटिबद्धता और एक सुनियोजित दीर्घकालीन योजना की आवश्यकता है परंतु ये दोनों बातें ही आज देखने को नहीं मिलतीं। दूसरी बात - जिस अंग्रेज़ी के बलबूते पर हम नाच रहे हैं उसमें भाषिक प्रवीणता की स्थिति का मूल्यांकन होना चाहिए। अंग्रेज़ी की स्थिति  जितनी चमकीली ऊपर  से दिखाई देती है वह पूरे भारत के संदर्भ में उतनी आकर्षक नहीं है। लोग जैसे तैसे एक खिचड़ी भाषा से अपना काम चला रहे हैं। हिन्दी की खिचड़ी शैली को एक आधिकारिक मान्यता प्रदान करके हम उसके विकास के लिए नहीं अपितु उसके ह्रास के लिए कदम उठा रहे हैं। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं का विकास तब होगा जब उसके अधिकाधिक शब्द औपचारिक व अनौपचारिक प्रयोग में आएंगे और विभिन्न भाषा-प्रयोग-क्षेत्रों में उसका प्रयोग, मान और वर्चस्व बढ़ेगा। 

सुरेन्द्र गंभीर



2011/10/17 Rahul Dev <rdev56@gmail.com>  

                                                            हिन्दी का ताबूत

हिन्दी के ताबूत में हिन्दी के ही लोगों ने हिन्दी के ही नाम पर अब तक की सबसे बड़ी सरकारी कील ठोंक दी है। हिन्दी पखवाड़े के अंत में, 26 सितंबर 2011 को तत्कालीन राजभाषा सचिव वीणा ने अपनी सेवानिवृत्ति से चार दिन पहले एक परिपत्र (सर्कुलर) जारी कर के हिन्दी की हत्या की मुहिम की आधिकारिक घोषणा कर दी है। यह हिन्दी को सहज और सुगम बनाने के नाम पर किया गया है। परिपत्र कहता है कि सरकारी कामकाज की हिन्दी बहुत कठिन और दुरूह हो गई है। इसलिए उसमें अंग्रेजी के प्रचलित और लोकप्रिय शब्दों को डाल कर सरल करना बहुत जरूरी है। इस महान फैसले के समर्थन में वीणा जी ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली केन्द्रीय हिन्दी समिति से लेकर गृहराज्य मंत्री की मंत्रालयी बैठकों और राजभाषा विभाग द्वारा समय समय पर जारी निर्देशों का सहारा लिया है। यह परिपत्र केन्द्र सरकार के सारे कार्यालयों, निगमों को भेजा गया है इसे अमल में लाने के लिए। यानी कुछ दिनों में हम सरकारी दफ्तरों, कामकाज, पत्राचार की भाषा में इसका प्रभाव देखना शुरु कर देंगे। शायद केन्द्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के उनके सहायकों और राजभाषा अधिकारियों द्वारा लिखे जाने वाले सरकारी भाषणों में भी हमें यह नई सहज, सरल हिन्दी सुनाई पड़ने लगेगी। फिर यह पाठ्यपुस्तकों में, दूसरी पुस्तकों में, अखबारों, पत्रिकाओं में और कुछ साहित्यिक रचनाओं में भी दिखने लगेगी।
सारे अंग्रेजी अखबारों ने इस हिन्दी को हिन्ग्लिश कहा है। वीणा उपाध्याय के पत्र में इस शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। उसमें इसे हिन्दी को सुबोध और सुगम बनाना कहा गया है। अंग्रेजी और कई हिन्दी अखबारों ने इस ऐतिहासिक पहल का बड़ा स्वागत किया है। इसे शुद्ध, संस्कृतनिष्ठ, कठिन शब्दों की कैद से हिन्दी की मुक्ति कहा है। तो कैसी है यह नई आजाद सरकारी हिन्दी ? यह ऐसी हिन्दी है जिसमें छात्र, विद्यार्थी, प्रधानाचार्य, विद्यालय, विश्वविद्यालय, यंत्र, अनुच्छेद, मध्यान्ह भोजन, व्यंजन, भंडार, प्रकल्प, चेतना, नियमित, परिसर, छात्रवृत्ति, उच्च शिक्षा जैसे शब्द सरकारी कामकाज की हिन्दी से बाहर कर दिए गए हैं क्योंकि ये राजभाषा विभाग को कठिन और अगम लगते हैं। यह केवल उदाहरण है। परिपत्र में हिन्दी और भारतीय भाषाओं में प्रचलित हो गए अंग्रेजी, अरबी, फारसी और तुर्की शब्दों की बाकायदा सूची दी गई है जैसे टिकट, सिग्नल, स्टेशन, रेल, अदालत, कानून, फौज वगैरह।
परिपत्र ने अपनी नई समझ के आधार के रूप में किन्ही अनाम हिन्दी पत्रिकाओं में आज कल प्रचलित हिन्दी व्यवहार के कई नमूने भी उद्धृत किए हैं। उन्हें कहा है - हिंदी भाषा की आधुनिक शैली के कुछ उदाहरण। इनमें शामिल हैं प्रोजेक्ट, अवेयरनेस, कैम्पस, एरिया, कालेज, रेगुलर, स्टूडेन्ट, प्रोफेशनल सिंगिंग, इंटरनेशनल बिजनेस, स्ट्रीम, कोर्स, एप्लाई, हायर एजूकेशन, प्रतिभाशाली भारतीय स्टूडेन्ट्स वगैरह। तो ये हैं नई सरकारी हिन्दी की आदर्श आधुनिक शैली। 
परिपत्र अपनी वैचारिक भूमिका भी साफ करता है। वह कहता है कि किसी भी भाषा के दो रूप होते हैं – साहित्यिक और कामकाज की भाषा। कामकाज की भाषा में साहित्यिक शब्दों के इस्तेमाल से उस भाषा की ओर आम आदमी का रुझान कम हो जाता है और उसके प्रति मानसिक विरोध बढ़ता है। इसलिए हिन्दी की शालीनता और मर्यादा को सुरक्षित रखते हुए उसे सुबोध और सुगम बनाना आज के समय की मांग है।
हमारे कई हिन्दी प्रेमी मित्रों को इसमें वैश्वीकरण और अंग्रेजी की पोषक शक्तियों का एक सुविचारित षडयंत्र दिखता है। कई पश्चिमी विद्वानों ने वैश्वीकरण के नाम पर अमेरिका के सांस्कृतिक नवउपनिवेशवाद को बढ़ाने वाली शक्तियों के उन षडयंत्रों के बारे में सविस्तार लिखा है जिसमें प्राचीन और समृद्ध समाजों से धीरे धीरे उनकी भाषाएं छीन कर उसकी जगह अंग्रेजी को स्थापित किया जाता है। और यों उन समाजों को एक स्मृतिहीन, संस्कारहीन, सांस्कृतिक अनाथ और पराई संस्कृति पर आश्रित समाज बना कर अपना उपनिवेश बना लिया जाता है। अफ्रीकी देशों में यह व्यापक स्तर पर हो चुका है।
मुझे इसमें यह वैश्विक षडयंत्र नहीं सरकार और प्रशासन में बैठे लोगों का मानसिक दिवालियापन, निर्बुद्धिपन और भाषा की समझ और अपनी हिन्दी से लगाव दोनों का भयानक अभाव दिखता है। यह भी साफ दिखता है कि राजभाषा विभाग के मंत्री और शीर्षस्थ अधिकारी भी न तो देश की राजभाषा की अहमियत और व्यवहार की बारीकियां समझते हैं न ही भाषा जैसे बेहद गंभीर, जटिल और महत्वपूर्ण विषय की कोई गहरी और सटीक समझ उनमें है। भाषा और राजभाषा, साहित्यिक और कामकाजी भाषा के बीच एक नकली और मूर्खतापूर्ण विभाजन भी उन्होंने कर दिया है।  अभी हम यह नहीं जानते कि किसके आदेश से, किन महान हिन्दी भाषाविदों और विद्वानों से चर्चा करके, किस वैचारिक प्रक्रिया के बाद यह परिपत्र जारी किया गया। अभी तो हम इतना ही जानते हैं कि इस सरकारी मूर्खता का तत्काल व्यापक विरोध करके इसे वापस कराया जाना जरूरी है। यह सारे हिन्दी जगत और देश की हर भाषा के समाज के लिए एक चुनौती है।
राहुल देव

पुनश्च - यह एक संक्षिप्त, फौरी प्रतिक्रिया है। इसका विस्तार करूंगा जल्द।

रविवार, 12 दिसंबर 2010

लोकतंत्र का राडियाकरण

भी तो 5800 में से हजार भी बाहर नहीं आए हैं। नीरा राडिया से देश की कई छोटी-बड़ी हस्तियों से फोन वार्ताओं के टेप ऐसे ही आते रहे तो अंत आने तक राजनीति, सरकार, नौकरशाही, उद्योग, मीडिया के जाने कितने आदरणीयों, स्वनामधन्यों, शक्तियों और सितारों के उजले चेहरों पर कालिख पुत चुकी होगी। भारत में नीरा राडिया और दुनिया में विकीलीक्स के लगभग दैनिक सूचना रिसाव से सत्ता और समृद्धि के मर्मस्थानों में एक बेआवाज़ हाहाकार मचा हुआ है। अभी राडिया के 140 टेपों से उठा गुबार बैठा भी नहीं है और 800 नए टेप सार्वजनिक हो गए हैं।

जब 140 टेपों की पहली किश्त बाहर आई और लोगों ने भारतीय मीडिया के सबसे चमकदार नक्षत्रों में से दो बरखा दत्त और वीर संघवी से सवाल पूछने शुरु किए तो इज्ज़त बचाने के कुछ कच्चे-पक्के तर्क दोनों ने ढूंढ लिए थे। बरखा ने तो माना कि नीयत भले ही ठीक रही हो पर कुछ विवेकहीनता उनसे हुई।  संघवी ने चतुराई नहीं छोड़ी और अपने सूचना स्रोतों को टिकाए-टहलाए रखने के लिए नीरा की बातों को सोनिया गांधी और अहमद पटेल तक पहुंचाने के झूठे वादे करने का बचकाना तर्क गढ़ा। नए टेपों ने वह आड़ भी उनसे छीन ली है। नए टेप में वीर संघवी बालसुलभ ललक के साथ नीरा को यह बताते सुने जा सकते हैं कि उन्होंने कैसी चालाकी से अपने साप्ताहिक स्तंभ में नीरा के आसामी (क्लाइंट) मुकेश अंबानी के व्यावसायिक हित को राष्ट्रीय हित का चोला ओढ़ा कर प्रधानमंत्री के नाम अपील का रूप दे दिया है। अपने वीर मित्र की इस कुशल वफादारी से प्रसन्न नीरा मुदित भाव से संघवी को शाबाशी देती हैं।

रतन टाटा अकेले नहीं हैं यह बात उठाने वाले कि राडिया टेपों को लीक और मीडिया में जारी करना उन सभी के निजता के अधिकार का उल्लंघन है जो इन टेपों में हैं। कौन इन गोपनीय टेपों को लीक कर रहा है और किस नीयत से, यह एक वाजिब सवाल है। टाटा इस पर सुप्रीम कोर्ट में गए हैं और कोर्ट ने उनकी अपील को निराधार नहीं माना है। लेकिन चंद लोगों की निजता के उल्लंघन से सैकड़ों गुना बड़े वे सवाल हैं जो इन टेपों के भीतर जो है उससे रोज खड़े हो रहे हैं। ये सवाल हैं हमारे सत्ता-उद्योग-राजनीति और मीडिया तंत्र के असली चरित्र के, उनके आपसी संबंधों के। हमारे तमाम आदरणीयों की  कथनी और करनी के अंतर के। मीडिया, खास तौर पर बड़े अंग्रेजी मीडिया महापुरूषों की रीढ़हीनता और दोमुँहेपन के।

इन टेपों को सुनना तकलीफ देता है। ऐसे बहुत से लोग जिन्हें आप तीस साल के पत्रकारीय अनुभव के बावजूद विश्वसनीय और खरा मानते रहे हों जब घोर धंधेबाजों के हाथों की कठपुतलियों जैसे सुनाई दें, उनके कहे पर लिखते, काम करते दिखाई दें तो जुगुप्सा होती है। यह सब जानते हैं कि खुले बाजार की इस विराट आर्थिक-राजनीतिक महामंडी में लगभग सभी या तो दुकानदार हैं या खरीदार या बिचौलिए। लेकिन कुछ कोने ऐसे होते हैं जहां आप विश्वास करना चाहते हैं। कुछ लोग, कुछ पद, कुछ काम ऐसे होते हैं जिनकी ईमानदारी और विश्वसनीयता में भरोसे के बगैर लोक की लोकतंत्र में आस्था नहीं टिक सकती। हम सबके मन में शायद एक कोना होता है जहां हम कुछ अच्छे भ्रमों को, कुछ छवियों को, कुछ नामों-चेहरों के बेदागपन को जिलाए रखना चाहते हैं। उन खुशफहमियों और छवियों का टूटना लोकमन को तोड़ता है। उदास, निराश और कमजोर करता है। राडिया टेपों से निकलता भारत को चलाने वाले तंत्र और लोगों का बदसूरत चेहरा भारत के लोकमन को कमजोर करने वाला है।

राजनीति और कॉर्पोरेट दुनिया के घनिष्ठ अंतर्संबधों के बारे में सब बरसों से जानते हैं। यह रिश्ता लगभग सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। बिना बड़े पैसे के राजनीति नहीं होती। पैसा लेकर संसद में सवाल पूछने वाले सांसदों को देश देख चुका है। पैसा लेकर संसद और विधानसभाओं में अपनी निष्ठा और वोट बेचने वाले जनता के प्रतिनिधियों को भी देख चुका है। यह खबर पुरानी हो गई। नई खबर यह है कि औद्योगिक घरानों के दलाल अब केन्द्रीय मंत्रियों को बनवाने की हैसियत रखते हैं। अपने
असामियों के हितों को साधने के लिए बड़े पत्रकारों से मनचाहा लिखवाने, उनका प्रधानमंत्री और उनके सलाहकारों, सोनिया गांधी और उनके सलाहकारों को संदेश भिजवाने और प्रभावित करवाने में इस्तेमाल करने की हैसियत रखते हैं। नया सच यह है कि अगर आप नीरा राडिया जैसे आक्रामक आकर्षण की प्रतिभा रखते हैं और मुनाफे के महाजाल में सबको फंसाने की कला जानते हैं तो सिर्फ आठ-नौ साल में 300-400 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर सकते हैं। बोलो दलाल स्ट्रीट जिन्दाबाद।

भारत के राजतंत्र का राडियाकरण अब भारत का नया सच है। और इस राडियाकरण के नए खलनायक हैं मीडिया के महापुरूष और महामहिलाएं। लेकिन हमारे लोकतंत्र और आजाद प्रेस की ही महिमा यह भी है कि आज ए. राजा गिरफ्तारी से कुछ ही दूर हैं। नीरा राडिया निरावृत, निरस्त्र और निर्कवच हैं। देश के औद्योगिक सम्मान की ऊंचाइयों पर विराजने वाले रतन टाटा एक दूसरे उद्योगपति-सांसद राजीव चंद्रशेखर के साथ काफी निचले स्तर की सार्वजनिक तू-तू-मैं-मैं में उलझ गए हैं। नैतिकता को अपने व्यावसायिक हितों से ऊपर रखने और व्यावसायिक सच्चरित्रता का अनुकरणीय आचरण करने का टाटा घराने का रिकार्ड धुंधला चुका है। डीएमके के करुणानिधि राजपरिवार की अंदरूनी पारिवारिक दुश्मनियां और खींचतान जगजाहिर हो चुकी है। यह सच भी नया है कि अब केन्द्रीय स्तर के राजनीतिक भ्रष्टाचार में पैसा हजार और लाख करोड़ में कमाया जाता है। दहाई और सैकड़े का भ्रष्टाचार करने वाले राजनीति के फुटकर व्यापारी हैं।

लेकिन शायद इस नए महाभारत का राडिया पर्व जो सबसे तकलीफदेह सच सामने लाया है वह हमारे मीडिया का सच है। सिर्फ एनडीटीवी की बरखा दत्त, हिन्दुस्तान टाइम्स के वीर संघवी और हाल तक इंडिया टुडे के प्रभु चावला ही नहीं देश के कई बहुत बड़े मीडिया घराने, कंपनियां, संपादक और संवाददाता नीरा राडिया और
उनके बहाने टाटा, अंबानी जैसे व्यापारिक घरानों के हितों के लिए सहर्ष काम करते दिखाई देते हैं। इनमें से किसी पर पैसे के लिए काम करने का आरोप हम नहीं लगा सकते। उसके कोई प्रमाण या संकेत भी अब तक जो राडिया टेप हमने सुने हैं उन में नहीं मिलते। इसलिए यह पत्रकारीय भ्रष्टाचार का मामला अभी तक नहीं बना है। लेकिन इससे जो सवाल निकल रहे हैं वे हमारे मीडिया के बुनियादी चरित्र के लिए, हमारी आत्मछवि के लिए जीवन मरण के सवाल होने चाहिए।

एक निजी पूंजीवादी, बाजार की अर्थव्यवस्था के भीतर, उसी से अस्तित्व और विकास पाते हुए भी समाचार मीडिया से सभी वर्गों के उचित हित में, राष्ट्रीय हित में, लोकहित में काम करने की उम्मीद की जाती है। हमसे निष्पक्षता की, दूसरे सभी तरह के हितों के टकराव में तटस्थता की, पारदर्शिता की और अपने विचारों में ईमानदारी की उम्मीद की जाती है। इसी उम्मीद की वजह से हमारी इज्जत है। इसी उम्मीद से पैदा विश्वसनीयता में हमारी ताकत है। इसी से लोकमन में हमारे लिए थोड़ी बहुत आस्था बनी हुई है। लोकतंत्र को और लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाने में हमारी भूमिका के प्रति कुछ आशा बनी हुई है। हाल के महीनों में ही भारतीय मीडिया ने जिस तीखेपन के साथ, जिस मुस्तैदी के साथ कॉमनवेल्थ खेलों, टेलीकॉम घोटाले वगैरह को उजागर किया है वह हमारे लिए गौरव की बात है। लेकिन राडिया कांड ने हमारे एक बड़े और शक्तिशाली हिस्से के दोमुंहेपन और व्यावसायिक अनैतिकता को बहुत निर्मम ढंग से उघाड़ दिया है।
  
मीडिया के इस अंधेरे कोनों का रोशनी में आना हमें दुःखी और शर्मिन्दा तो करता है लेकिन इसे हम चाहें तो दवा भी बना सकते हैं। इस कांड ने समूचे मीडिया को एक नए आत्ममंथन के लिए बाध्य किया है। इन कुरूप सच्चाइयों से मुंह चुराना अब संभव नहीं। यह मौका है अपने मीडिया को फिर से साफ करने का। अपने आदर्शों, अपने आचरण और अपने दावों को फिर से एक पटरी पर लाने, उनके बीच की दूरी को मिटाने का। रोशनी गंदगी दिखाती तो है लेकिन अगर गंदगी अंधेरे में अदृश्य ही बनी रहे तो दूर कैसे होगी ?

क्या भारत का मीडिया इस दुखद लेकिन दुर्लभ मौके का फायदा उठाएगा?

(आज समाज में प्रकाशित लेख)







मंगलवार, 16 नवंबर 2010

भारतीय भाषाओं का भविष्य - सम्यक् गोष्ठी - दिल्ली - 19 मई, 2008





Posted by Picasaइंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित गोष्ठी के कुछ चित्र।
उद्घाटन किया दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने। विशेष  अतिथि थे ललित कला अकादमी अध्यक्ष और लेखक अशोक वाजपेयी और अमरीका के पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के हिन्दी प्रोफेसर डा. सुरेन्द्र गंभीर।
सहभागी थे राजधानी के वरिष्ठ लेखक, पत्रकार, अर्थशास्त्री और भाषा प्रेमी।

भारतीय भाषाओं का भविष्य - मुंबई गोष्ठी, मई, २००८


मुंबई में मई 2008 में - भारतीय भाषाओं के भविष्य पर महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी और सम्यक न्यास का संयुक्त परिसंवाद।
स्थान - इंडियन मर्चेंट्स चैंबर, चर्चगेट।
नीचे के सभी चित्र परिसंवाद के।
वक्ताओं में शामिल थे महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष नंद किशोर नौटियाल, मंत्री अनुराग त्रिपाठी, सम्यक न्यास के राहुल देव, अमरीका से आए पेनसिल्वेनिया के हिन्दी प्रोफेसर डा. सुरेन्द्र गंभीर, फिल्मकार महेश भट्ट, स्विस लेखक और पत्रकार बर्नार्ड इमहेस्ली, मनोवैज्ञानिक और लेखिका रशना इमहेस्ली, मुंबई गुजराती समाज के अध्यक्ष, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी के उपाध्यक्ष,  कालनिर्णय के प्रकाशक-संपादक जयराज सलगाँवकर, हिन्दी, मराठी, गुजराती, तमिल के लेखक, पत्रकार, विज्ञापनकर्मी और तमाम भाषा प्रेमी। 

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

Learning Hindi is good for your brain


Learning Hindi has an advantage over English-it exercises more areas of the brain compared to the Queen's language.
In a first-of-its-kind study in the country, scientists have discovered that reading Hindi involves more areas of human brain than English.
Scientists at the Manesar-based National Brain Research Centre (NBRC) have for the first time studied the processing of an Indian script-Devanagari-in the human brain using functional Magnetic Resonance Imaging (fMRI).
In Devanagari, consonants are written in a linear left-to-right order and vowel signs are positioned above, below or on either side of the consonants.
As a result, the vowel precedes the consonant in writing certain words but follows it in speech making it a unique script.
"Our results suggest bilateral activation-participation from both left and right hemispheres of the brain-for reading phrases in Devanagari," said Nandini Chatterjee Singh, who led the multi-disciplinary team of researchers.
The human brain does not have dedicated neurological circuits specifically meant for reading.
Therefore, reading involves restructuring of the existing neural architecture or activation of certain areas of the brain depending on the script one is reading.
English, which uses the Roman script, is alphabetic. That is, it has vowels and consonants that are written linearly from left to right. Reading English-and other alphabetic languages-involves activation of areas in the left hemisphere of the brain.
In contrast, Devanagari has the properties of both alphabetic and syllabic scripts. Scientists have found reading the language involves activation of the left and right hemisphere.
The result of the study has recently appeared in journal Current Science. Researchers used the fMRI technique to record images of a working brain while reading Hindi. The study was conducted with individuals who primarily read Devanagari.
"While it is difficult to find in India a population that reads only Hindi and no English, we could manage to find individuals who primarily read Hindi and have been doing so for the last 20 years," Singh said.
In India, she said, children usually learn to read two scripts (often English and a regional language) almost simultaneously in school.
"If this is the best way to teach our children still remains to be determined. What the implications of this are for dyslexia is also something we are investigating. The practical implications of our studies will hopefully emerge in the next few years," Singh added.
(Learning Sanskrit would be even better!
Actually, the title of the report is misleading - it should've been "Learning Devanagari is good for your brain", though presumably the research findings would apply to any Brahmi script.)
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Hindi as national language


All Indian languages face a long term decline and gradual marginalisation at the hands of the growing influence of English. The country hasn’t even begun recognising the fast changing language use patterns and their implications for the future of Indian languages, and through them, the very sense of Indianness. That’s why people have no problem with the growing role of English as the virtual national language of India, though not of Bharat, though less than 1% of Indians can use it well (figure quoted by the National Knowledge Commission) while they have big trouble accepting even the idea of Hindi as the national language though 50-60% Indians understand it. This is an inexplicable phenomenon – greater acceptability of a language that is not just alien to 99 % of our countrymen but also an agent of alienation and social divides; vis-a-vis a language which is their own, a sister to their own mother language. By the time the country realises what it has lost through neglect of its indigenous languages in the mad and stupid rush to adopt English it will be too late.
Mr. Krishnan, I congratulate you on your wise and bold thoughts. It is not often that one finds a non-Hindi speaker advocating Hindi as national language in an objective, rational manner. The history of our freedom struggle is replete with great national figures from the non-Hindi parts of the country who worked for Hindi as national language as a means for socio-cultural-political unity as well as growth of India. Gandhi, of course, was the first among them.
Rahul Dev

The above post is in reaction to Mr. Krishnan’s piece in MSN, reproduced below.

Indian constitution does not specify Hindi or any other language as India’s National Language. In 1950, Hindi was declared as the OFFICIAL LANGUAGE of the union. Use of English for official purposes was to cease after 26 January 1965. Heeding protests from non Hindi-speaking areas of India, Parliament enacted the ‘Official Languages Act, 1963’ authorising continued use of English for official purposes along with Hindi, even after 1965. Even today, the sixty year-old Indian Republic does not have a national Language.
According to the Indian constitution, Parliamentary proceedings may be conducted in either Hindi or English. In addition, a person who is unable to express himself/herself in either Hindi or English is permitted to address the House in his/her mother tongue, with the permission of the Speaker of the relevant House.
In the sixty (60) years of Indian Republic, much has changed to warrant a review of the constitutional provisions governing National, Official and Parliamentary languages.
1.Make Hindi our ‘National Language’: In the past six decades, Hindi has progressed dramatically in terms of its reach and acceptance. Today an estimated 60% or more Indians can speak and understand Hindi. Therefore, HINDI now fully qualifies to be India’s National Language. Efforts to teach and develop Hindi must go on.
2.English must continue: Consequent to India’s emergence as a global power, knowledge of English has assumed great importance for the progress of our people in all spheres of life. English deserves to continue as ‘prime official language’ along with Hindi, for domestic and overseas use. Renewed vigorous efforts are required for training our people in English.
3.Regional Languages must be promoted: India’s rich cultural heritage must be preserved and promoted at all costs. For this purpose, learning of Regional languages must be made mandatory in all teaching institutions in the respective states. Thus Hindi (National Language), English, and the respective Regional language will form the ‘3-Language formula’ for official use in all Indian States. Where Hindi is the Regional Language, English and Hindi will be the official languages.
4.Simultaneous translation facility in Parliament: Transactions in the parliament must be capable of being understood by every member of the House. Parliamentary democracy demands that speakers enjoy the privilege to speak either in the two official languages or in any Regional language according to their preference. Simultaneous translation facility must be available so that all the members in the house are able to understand one another regardless of the language of address. Unless and until the whole house understands one another, parliamentary democracy cannot be deemed satisfactory.
Let us move with the time and do what time demands.
P V V Krishnan